ग्लोबल वार्मिंग की चेतावनी हमें कागजी दैत्य की तरह लग रही है, ये जानते हुए कि पहले की अपेक्षा वातावरण में 30% कार्बन अधिक उत्सर्जित हो रहा है और स्टीफन हॉकिंग की भविष्यवाणी भी है कि 600 वर्षों के बाद पृथ्वी आग का गोला बन कर रह जाएगी. अगर ऐसा न होता तो विश्व इसकी गंभीरता को समझ रहा होता. पर्यावरण – सम्मेलन तो होते रहते हैं, जो बहस, नारे और वादों में सिमट कर रह जाते हैं. कागज़ पर लिखी इबारतें कागज पर तड़प रही होती हैं और लोग पुनः पर्यावरण नाशक उपक्रम शुरु कर देते हैं. स्पष्ट है संरक्षण और नाश समानान्तर चल रहा है.

वैज्ञानिक तो आगाह कर चुके हैं, ‘बढ़ता तापमान मौत की सजा का फरमान है.’ पर्यावरण संरक्षण की कसौटी पर भारत 180 देशों में सबसे निचले पायदान पर हैं. सब कुछ जानते समझते हुए भी हम अंधाधुंध विकास के नाम पर वनों की बेरहम कटाई में जरा भी संकोच नहीं करते. वो विकास जो भविष्य के लिए भयानक उष्मा की व्यवस्था कर रहा होता है. हसदेव अरण्य इसका ताजा उदाहरण है. विकास बहरा है उसे धरती का आर्तनाद सुनाई नहीं देता. वृक्षों की बलि देकर वह अपने सिर पर जीत का सेहरा बांधता है. संरक्षक संस्थाओं की पुकार अंतरिक्ष का हिस्सा होकर रह जाती है. संसाधनों, सुविधाओं के आदी लोग पेड़ काटकर एसी लगाने को आधुनिकता समझते हैं. नैसर्गिक एयरकंडीशनिंग उन्हें पसंद नहीं आती. एक 20 वर्षीय वृक्ष 2 टन कार्बन अवशोषित करता है. एसी के फुटप्रिंट को संतुलित करने के लिये सालाना 2 पेड़ लगाने की जरूरत है. कोई अगर हर दिन दो लीटर पेट्रोल खर्च करता है तो उसे भी साल में एक या दो पेड़ जरूर लगाने चाहिए.
ग्लोबल वार्मिंग के कारण बादलों की बनावट असर
ग्लोबल वार्मिंग के कारण बादलों की बनावट यानी इनके स्ट्रक्चर और उनके काम करने के ढंग यानी फंक्शन पर बहुत असर डाला है. एक वैज्ञानिक रिसर्च से यह बात सामने आई है कि जैसे-जैसे धरती का तापमान बढ़ रहा है, बादलों के बनने, उनके ऊंचाई पर मौजूद रहने और बारिश कराने के उनके तौर तरीकों में बदलाव आ रहे हैं, जिस तरह इस साल मार्च के महीने में देश के कई हिस्सों में लू चली और फिर अप्रैल के पहले सप्ताह में ही एक ही दिन 20 राज्यों में भयानक आंधी आयी, बादल गरजे, लपके, वह सब कोई अचानक घटी अनहोनी नहीं थी बल्कि लगातार बढ़ रही ग्लोबल वार्मिंग का एक सामान्य नतीजा थी. पहले भी इस संबंध में हुए कई अध्ययनों में वैज्ञानिकों ने पाया है कि बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग के कारण आसमान पर तैरते बादलों की स्वाभाविक गति में अनियंत्रित बदलाव आए हैं.

यानी दरअसल बादल जब अपनी स्वाभाविक गति से आसमान में तैरते हैं तो ये वातावरण को न आवश्यकता से ज्यादा गरम होने देते हैं और न ठंडा. पृथ्वी के ताप संतुलन पर बादल के प्रभाव को वाट/वर्ग मीटर ऊर्जा प्रवाह के रूप में मापा जाता है. उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में बादल 100 वाट प्रति वर्ग मीटर की दर से सौर ऊर्जा परावर्तित करके पृथ्वी को ठंडा रखते हैं. पृथ्वी को ठंडा करने की इस प्रक्रिया को बादलों द्वारा पृथ्वी से परावर्तित होने वाली सौर ऊर्जा को रोकने से उत्पन्न ग्रीन हाऊस प्रभाव से संतुलित रखा जाता है. इस प्रकार बादलों के समीप का वायुमंडल गर्म रहता है तथा पृथ्वी की सतह अपेक्षाकृत ठंडी रहती है. उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से दूर के क्षेत्रों में बादल सौर ऊर्जा को 50 से 100 वाट प्रति वर्ग मीटर की दर से परावर्तित करके पृथ्वी को ठंडा रखते हैं. भूमंडल के लिए प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि बादल समस्त भूमंडल के गर्म होने की प्रक्रिया को औसतन 13.2 वाट प्रति वर्ग मीटर की दर कम कर देते हैं. एक अनुमान के अनुसार यदि आसमान में बादल बिल्कुल बिल्कुल ही न रहें परंतु अन्य सभी चीजें जैसी और जितनी हैं उतनी ही रहें तो सौर ऊर्जा पूरी पृथ्वी को इस तरह गर्म करेगी जैसे पूरे भूमंडल पर प्रत्येक 5 वर्ग मीटर जगह में एक 60 वाट का बल्ब लगा हो. बोबल नके क्शन पर आई है ादलों के कराने न तरह में लू क ही गरजे, हीं थी मा पृथ्वी की गर्माहट से प्रभावित 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस जलवायु-विज्ञानी मानते हैं कि पृथ्वी पर ऊष्मा का वितरण सुनिश्चित करने, पृथ्वी के मौसम को और पृथ्वी की जलवायु को निर्धारित करने में बादलों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, बादलों का निर्माण भी पृथ्वी की गर्माहट से प्रभावित होता है. इस शताब्दी के जलवायु संबंधी आंकड़े बताते हैं कि शताब्दी की सबसे गर्म वर्षों में आसमान में बादलों की उपस्थिति औसत से अधिक रही है. इन बादलों ने पृथ्वी को और अधिक गर्म होने से बचाया है. डोने देते के मापा प्रति पृथ्वी क्रिया सौर आसमान में छाए बादल धरती की ओर आने वाले सूरज के अलबीडो प्रभाव को दोगुना कर देते हैं, लेकिन साथ ही बादल पृथ्वी से परावर्तित होकर लौटने वाली ऊष्मा को लौटने नहीं देते और पृथ्वी की सतह को गरम रखते हैं. इस प्रकार ग्रीन हाउस प्रभाव को बढ़ाते हैं. समय, स्थान और बादलों की किस्म के अनुसार ये परस्पर विरोधी प्रभाव किस प्रकार घटते- बढ़ते रहते हैं? यह प्रश्न जलवायु विज्ञानियों की जिज्ञासा का विषय रहा है. केवल कुछ ही समय पहले तक वैज्ञानिक इन प्रभावों को प्रत्यक्ष रूप से मापने में सक्षम नहीं थे. परंतु, अब स्थितियां काफी स्पष्ट हैं|

आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि महासागर पृथ्वी का सबसे अधिक अंधकारमय क्षेत्र है जो उष्णकटिबंधीय प्रदेशों में से केवल दस प्रतिशत सौर ऊर्जा परावर्तित करते हैं. इनके विपरीत ध्रुवीय प्रदेश सबसे अधिक चमकीले क्षेत्र हैं, लेकिन सहारा और सऊदी अरब के रेगिस्तानों से भी करीब 40 प्रतिशत सौर ऊर्जा परावर्तित होती है. भूस्थलों में उष्णकटिबंधीय वर्षा वन सबसे अंधकारमय क्षेत्र है जहां से सौर ऊर्जा का केवल 10-15 भाग ही परावर्तित हो पाता है. बादल बनाने में नमी का भी बहुत बड़ा हाथ होता है. जिस क्षेत्र में नमी जितनी अधिक होगी उस क्षेत्र में बादल उतने ही अधिक बनेंगे. यही कारण है कि रेगिस्तान से ऊष्मा के अधिक परावर्तित होने के बावजूद नमी की कमी के कारण बादल कम बनते हैं अब तक की जानकारी से यह स्पष्ट है कि बादल बनने की प्रक्रिया और इनके स्वरुप के बीच गहरा संबंध होता है. वायु की अत्यंत व्यग्र तरंगों के द्वारा बनने वाले बादल प्रायः धुनी हुई रुई के समान नजर आते हैं. ठीक इसके विपरीत जिन बादलों का जन्म हवा की मंद-मंद उठने वाली तरंगों के जरिए होता है, वे अकसर परत-दर-परत दिखाई पड़ते हैं.

ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के उपाय
1.वनों की रक्षा और वृक्षारोपण
- वनीकरण और पुनर्वनीकरण: बड़े पैमाने पर पेड़ लगाना और जंगलों को कटने से बचाना। पेड़ CO2 को अवशोषित करते हैं।
- भारत की पहल: ग्रीन इंडिया मिशन और बोनसाई जैसी योजनाएँ वृक्षारोपण को बढ़ावा देती हैं।
- उदाहरण: स्थानीय स्तर पर सामुदायिक वृक्षारोपण अभियान में भाग लें।
- प्रभाव: कार्बन सिंक बढ़ने से वातावरण में CO2 की मात्रा कम होती है।

2. परिवहन में बदलाव
- इलेक्ट्रिक वाहन (EV): पेट्रोल/डीजल वाहनों के बजाय इलेक्ट्रिक वाहनों को प्राथमिकता दें। भारत में 2030 तक 30% EV बिक्री का लक्ष्य है।
- सार्वजनिक परिवहन: बस, मेट्रो, और साइकिल जैसी पर्यावरण-अनुकूल परिवहन प्रणालियों का उपयोग करें।
- उदाहरण: दिल्ली मेट्रो और ई-बस सेवाएँ कार्बन उत्सर्जन को कम कर रही हैं।
- प्रभाव: परिवहन से होने वाला CO2 उत्सर्जन, जो वैश्विक उत्सर्जन का 24% है, कम होता है।
3. जलवायु-अनुकूल कृषि
- जैविक खेती: रासायनिक उर्वरकों के बजाय जैविक खाद और प्राकृतिक कीट नियंत्रण का उपयोग करें।
- कम मीथेन उत्सर्जन: धान की खेती में जल प्रबंधन (जैसे वैकल्पिक गीला-सूखा विधि) से मीथेन उत्सर्जन कम करें।
- उदाहरण: भारत में परंपरागत और जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए पीएम-प्रणाम योजना लागू की गई है।
- प्रभाव: कृषि से होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, जो वैश्विक उत्सर्जन का 18% है, कम होता है।
4. नीति और सामुदायिक जागरूकता
- सरकारी नीतियाँ: सरकारों को सख्त उत्सर्जन मानक लागू करने और कार्बन टैक्स जैसे उपाय अपनाने चाहिए। भारत ने 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है।
- जागरूकता अभियान: स्कूलों, कॉलेजों, और समुदायों में ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों और समाधानों पर जागरूकता बढ़ाएँ।
- उदाहरण: भारत में एनसीसी और एनएसएस जैसे संगठन पर्यावरण जागरूकता अभियानों में सक्रिय हैं।
- प्रभाव: सामाजिक और नीतिगत बदलाव से दीर्घकालिक स्थिरता बढ़ती है।
5. व्यक्तिगत स्तर पर उपाय
- ऊर्जा बचत: बिजली के अनावश्यक उपयोग को कम करें, जैसे लाइट और पंखे बंद करना।
- पानी की बचत: पानी की बर्बादी कम करें, क्योंकि जल संरक्षण ऊर्जा खपत को भी कम करता है।
- शाकाहारी भोजन: मांस की खपत कम करें, क्योंकि पशुपालन से मीथेन और CO2 उत्सर्जन बढ़ता है।
- उदाहरण: सप्ताह में एक दिन “मीटलेस मंडे” अपनाना।
- प्रभाव: व्यक्तिगत कार्बन फुटप्रिंट में कमी।
6. कार्बन कैप्चर और स्टोरेज (CCS)
- तकनीकी समाधान: कार्बन कैप्चर और स्टोरेज तकनीकों का उपयोग, जो उद्योगों से CO2 को कैप्चर करके भंडारण करता है।
- भारत में स्थिति: भारत में CCS प्रोजेक्ट्स प्रारंभिक चरण में हैं, लेकिन NTPC और ONGC जैसे संगठन इस पर काम कर रहे हैं।
- प्रभाव: औद्योगिक उत्सर्जन में कमी।